चूड़ी एक परम्परा, एक फैशन
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- Thursday, 03 January 2013 00:23
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चूड़ियों का महत्त्व-सुहाग का प्रतीक चूड़ियां प्राचीन सभ्यता से ही देखने को मिलती है. इतिहास में भी मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा काल की स्त्रियों की कलाई चूड़ियों से सजी दिखलाई देती है.उस समय की स्त्रियां बाजू तक चूड़ियां पहना करता थी.चूड़ी की खनक जितनी प्यारी होती है उतना ही इसका महत्व भी है. सुहागनें चूड़ी को सुहाग के प्रतीक के रूप में पहनती हैं तो कुंवारी लड़कियां चूड़ी फैशन के तौर पर पहनती हैं.चूड़ी की खनक और महत्व वक़्त के बदलने के साथ कम नहीं हुआ है. वर्तमान दौर में लड़कियां हर वक़्त चूड़ी नहीं पहनती लेकिन खास मौके पर वे जरूर तैयार होती हैं.चूड़ी सिर्फ़ पहनने का आभूषण नहीं है बल्कि यह हमारी संस्कृति और सभ्यता है. आजकल रेडियम प्लेटेड चूड़ियां, रेडियम पॉलिश्ड सोने की चूड़ियां, हीरे जड़ित सोने व ब्राइट गोल्ड की चूड़ियां दुल्हन की ख़ास पसंद बन गई हैं. शादियों में भी हर धर्म के लोग अलग-अलग तरीके से दुल्हन को चूड़ियां भेंट की जाती है. मारवाड़ी दुल्हनें सोने व आइवरी की चूड़ियां पहनती हैं. राजपूत दुल्हन की चूड़ी में साधारण आइवरी की चूड़ियां होती हैं जो आकार के हिसाब से कलाई से लेकर कंधे तक पहनी जाती हैं.उत्तर प्रदेश में दुल्हनें लाख की लाल व हरी चूड़ियां पहनती हैं. राजस्थान व गुजरात की अविवाहित आदिवासी महिलाएं हड्डियों से बनी चूड़ियां पहनती हैं, जो कलाई से शुरू होते हुए कोहनी तक जाती हैं लेकिन वहां की शादीशुदा महिलाएं कोहनी से ऊपर तक ये चूड़ियां पहनती हैं. लाख की लाल रंग की चूड़ी, सफेद सीप व मोटी लोहे की चूड़ी जिसे सोने में भी पहना जाता है. परंपरागत रूप में केरल में दुल्हन सोने की चूड़ियाँ कम संख्या में पहनती हैं. कई मुस्लिम परिवारों में चूड़ियाँ नहीं पहनी जाती हैं, फिर भी हल्दी की रस्म के दौरान कुछ राज्यों की महिलाएँ लाल लाख की चूड़ियाँ पहनती हैं.
चूड़ियां एक रिवाज के तौर पर
चूड़ियां पहनने का रिवाज आदिकाल से चला रहा है.रंग-बिरंगी खनखनाती चूड़ियां, जहाँ कलाई में सुंदर लगती हैं, वहीं उनकी मधुर ध्वनि कानों को भी प्यारी लगती है. हरी और लाल रंग के अलावा सुनहरीऔर सफ़े द रंग की चूड़ियां भी रिवाज में हैं. ये सौभाग्य और खुशहाली की प्रतीक मानी जाती है.कई प्रांतों में शादी की रस्म के साथ दुल्हे द्वारा दुल्हन को चूड़ी पहनाने की रस्म अदा की जाती है. कुल मिलाकर लड़कियों एवं महिलाओं की खुशी के रंग चूड़ी के संग गुज़रते हैं जो सुख एवं खुशहाली की प्रतीक मानी जाती हैं.
वर्तमान फैशन और चूड़ियां
चूड़ी श्रृंगार का एक ऐसा आभूषण है, जिसे हर नारी पहनना पसंद करती है.चूड़ियाँ पहनने के बढ़ते शौक़ व फैशन के कारण इनके दाम भी बढ़ते जा रहे हैं. अत: चूड़ी पहनते समय कुछ बातें ध्यान में रखकर इनकी उम्र व सुदंरता बढ़ाएँ. हाथों को नई चूड़ियाँ पहनने से पूर्व गीला न होने दें. हाथों को कोई क्रीम लगाकर मुलायम कर लें. इससे चूड़ी पहनने में आसानी होती है.बाहों को चूड़ी पहनते समय ढीला रखें, चूड़ी तने हुए हाथों में कठिनाई से चढ़ती है. नई चूड़ी पहनने के बाद इन पर कोई भी सुगन्धित तेल लगाए. ऐसा करने से चूड़िय़ों में मज़बूती आ जाती है, साथ ही इनकी चमक भी अधिक दिनों तक बनी रहती है. हाथों में इतनी ढीली चूड़ियां न पहने कि वह जरा से धक्के से टूट जाएं और न ही इतनी कसी या छोटी चूड़ियां पहने कि उनसे कलाई का सौन्दर्य बिगड़ जाए. पहले सबसे ज़्यादा कांच की ही चूड़ियां प्रचलित थी, पर आधुनिक समय में सोना, चांदी, प्लेटिनम, प्लास्टिक, लकड़ी और फेरस मटेरियल की भी चूड़ियाँ काफ़ी प्रचलन में हैं. एक समय में लाह की चूड़ी भी काफ़ ी प्रचलित थी और आज भी कुछ क्षेत्र में शादीशुदा लड़की शादी के कुछ दिनों के बाद तक लाह की चूड़ी अवश्य ही पहनती है.लेकिन किसी भी प्रकार की चूड़ियाँ परंपरागत भारतीय महिलाओं में ज़्यादा लोकप्रिय हैं और वे इसे शादी के बंधनों का प्रतीक मानती हैं. आज कल चूड़ियों के साथ कड़े का भी प्रचलन है. धीरे-धीरे कड़े के स्थान पर पोंची आया जो कोनिकल सेप का होता था.अब यह कड़ा चूड़ियों के साथ पहना जाने लगा है जो किसी सुहागन को विवाह के समय वर पक्ष द्वारा दिया जाता है.पोंची का प्रचलन आज भी राजस्थान में है. यह सिल्वर तथा मोती का बना होता है जो सुहागन को वर पक्ष द्वारा दिया जाता हैभारतीय चूड़ियां अब विदेशी सैनानियों के हाथों में भी देखा जाने लगा है.






